बाबू वीर कुँवर सिंह

बाबू वीर कुँवर सिंह (१७७७ - १८५८) १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के महान सिपाहियों में से एक थे| ८० वर्ष की आयु में, सन् १८५७ के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में इन्होने ईस्ट इंडिया कंपनी से लोहा लिया और बहुत से युद्धों में विजय हासिल की| इनका जन्म बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर में शाही राजपूत परिवार में सन् १९७७ में हुआ था|
 
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान:
 
वीर कुँवर सिंह महान योद्धा थे, उन्होंने ५ जुलाई को दानापुर के विद्रोही सैनिकों की कमान सम्हाली| उन्होंने २ दिनों के बाद उन्होंने आरा पर अपना अधिकार कर लिया| ३ अगस्त को मेजर विंसेंट आयर के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने कुँवर सिंह को पराजित कर दिया और जगदीशपुर को तहस नहस कर दिया| मजबूरन कुँवर सिंह को जगदीशपुर छोड़कर लखनऊ आना पड़ा| फिर भी इस महान योद्धा ने उन्होंने हार नहीं मानी और मार्च १८५८ में आजमगढ़ पर अपना अधिकार कर लिया| जल्द ही उन्हें ये स्थान भी छोड़ना पड़ा| अप्रैल १९२३ को कुँवर सिंह ने कैप्टन ले ग्रैंड को जगदीशपुर के नजदीक हराकर विजयश्री प्राप्त की|
                           २३ अप्रैल १९२३ को जगदीशपुर के नजदीक गंगा नदी पार करते समय बाबु वीर कुँवर सिंह को अंग्रेजों की गोली लग गयी| तदुपरांत उन्होंने अपना हाथ माँ गंगा को अंतिम दान कर दिया| गंभीर रूप से घायल  होने के कारण २४ अप्रैल १९५८ को उनकी मृत्यु हो गयी| जबतक जीवित रहे
इस वीर बांकुड़ा ने अंग्रेजों के छक्के छुडा दिए और मरते समय तक उन्होंने जगदीशपुर को आजाद रखा| बाबु वीर कुँवर सिंह की याद और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनकी अमूल्य भूमिका के लिए २३ अप्रैल १९६६ में भारत सरकार ने १ रुपये की डाक टिकट जारी किये|
 
 
 
 
अनमोल वचन: सौ दिन भेड़ की तरह जीने से, दो दिन शेर की तरह जीना ज्यादा अच्छा है|

फोटो 1: बाबू वीर कुँवर सिंह.
फोटो 2: बाबु वीर कुँवर सिंह की डाक टिकट